बेबसी के बीच रास्तों कि तलाश
March 8, 2008 by lovelykumari
यह कहानी है छोटा मंगर बिरहोर की जो झारखण्ड के धनबाद स्थित तोपचांची पंचायत के चलकरी गाँव मे रहता है. आज उससे ज्यादा बेबसी किसी और की आंखों मे नही देखी जा सकती. उसकी ५० बरस की बूढी आँखें आज भी अपने बेटे कार्तिक बिरहोर की रह देख रही है जिसे यहाँ के स्थानीए दलाल काम दिलाने के सब्जबाग दिखा कर जयपुर ले गए.अब न तो उसे वहाँ से आने दिया जाता है और न हि उसके द्वारा किए गए कामो का उचित पारिश्रमिक हि दिया जाता है. इस बाबत मैंने उपायुक्त को भी आवेदन दिलवाया आश्वासन मिला की जल्दी हि कार्यवाही की जायेगी.पर परिणाम नदारद है.छोटा मंगर जैसे कितने पिताओं ने प्रखंड कार्यालय के चक्कर इस आस मे कटे हैं की उनके बुदापे का सहारा किसी भी प्रकार उनके पास वापस आ जाए.आवेदन और दर्द के रास्तों से गुजरती इस कथा का परिणाम भी अंततः वही होगा जो अक्सर होता आया है माँ-बाप, और पत्नी की बेबस आँखें यहाँ मदद की आस मे हर आने जाने वालों की तरफ देखती रहेगी और वहाँ कार्तिक जैसे नवयुवक इन दलालों की भेट चढ़ते रहेंगे. दरअसल देखा जाए तो यह कहानी सिर्फ़ एक कार्तिक बिरहोर की न होकर झारखण्ड के सैकडों आदिवासियों की है जो सरकारी मदद की आस मे पलायन की भयंकर मार झेलने को विवश हैं. एतवा बिरहोर (२५ वर्ष ) को दलालों ने नौकरी काम झांसा देकर किसी अज्ञात जगह बंदी बना लिया है इनके घरवाले रोज इनके आने की आस देखते हैं.पर इनकी सुधि लेने वाला कोई नही है.जबकि इस बाबत मिडिया, स्थानिये विधायक और प्रसाशन सबको खबर है.जाने कब होगा इनकी पीडा का अंत…


aap ne achchaa likhaa hai….